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शीर्ष सत्ता का अहंकार ,लोकतंत्र की चादर में छुपी चीत्कार,बदलते संस्कार

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भारत प्राचीन काल से नाना प्रकार के प्राकृतिक ईश्वरीय देनो से परिपूर्ण रहा हैं .नाना प्रकार की विभिन्नताए उसके आभूषण कहे जाते हैं ,दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र अमेरिका के बाद हमारे देश का लोकतंत्र ,संकटो का सामना करता हुआ देश को आज़ादी के बाद खादी से रेडीमेड कपडे ,बैलगाड़ी से मोटर कारो तक ले आया ,भाप इंजन से डीजल इंजन तक का सफ़र कोई आसान नहीं था . हवाई उड़ाने जो कभी सड़क पर चलने वाले के लिए सपना थी .अब उपलब्धता में बदल गयी हैं .

पर कोई हैं दम्भी हैं अपने दंभ में भारत की 125 करोड़ जनता के किये कराये पर पानी फेर देता हैं वो सवाल करता हैं पूंछता हैं …..

देश के पहले प्रधान मंत्री जिनको हिन्दोस्तान की जनता के श्रम शक्ति पर संदेह हैं

क्या हुआ पिछले सत्तर सालो में देश का अपमान जैसा प्रतीत होता हैं पर उसके सवाल को विशेष बना कर जनता के बीच एक नारे के रूप में स्थापित करने का प्रयास होता हैं ,कभी ये नारा तिरंगा हाथ में ले कर तो कभी भारत माता के नारे की आड़ में दिया जाता हैं ,या फिर भगवां रंग में रंग कर जय श्री राम का नारा लगा कर पूंछा जाता हैं . किसी भी समाज ,या देश का विकास क्र्मनुवंशी होता हैं आदिम युग से मानवता आज जो आधुनिक हैं हो सकता हैं हज़ारो साल बाद कोई और शब्द हमारे लिए भी प्रयोग किया जाएगा .आज का वर्तमान आने वाले समय का इतिहास बन जाएगा तब पीडिया ही सही आंकलन कर पाएंगी ,की हमाने जो वर्तमान में किए वो सही था

या ऐतहासिक भूल ?

स्वतंत्रता के बाद लोकतंत्र को शक्तिशाली करने वाले स्तंभों की नींव कमजोर हो जाए तब लोकतंत्र भरभरा का बिखर जाता हैं भले ही उसको लोकतंत्र की दुहाई दे कर वर्तमान सत्ता सुधार का आडम्बर करे , आज़ादी को लोकतंत्र के उन मज़बूत खम्बो की रस्सियों के सहारे बाँध दिया जाता हैं सवाल करना यहाँ अधिकार नहीं देशद्रोह का पर्याय बन जाता हैं .ऐसा तब ही होता हैं जब क़ानून को तोड़ कर कातिल को बचाने वाला वकील क़ानून का इस्तेमाल कर उसे बचा लेता हैं . तब आम देशवासियों को लगता हैं ,हमारे क़ानून में ही कोई कमी होगी ,उसको ठीक किया जाना चाहिए था .अगर ऐसा ही कोई संविधान के साथ सत्ताधीश करें तब कहाँ संविधान और कहाँ क़ानून ?

देश वर्तमान में कई तरफा संकटों का सामना कर रहा हैं कोरोना नाम की महामारी पर जहाँ सरकार सत्ता का प्रहसन कर जनता का ध्यान भटकाना चाहती हैं ,दूसरी तरफ चीन की घुसपैठ पर कबूतर की तरह आँख मूँद लेती हैं . संघीय ढाँचे और लोकतंत्र स्थापित करने के लिए मायावी असुर की तरह माया जाल में कुछ अति-महत्वाकांक्षी विपक्ष के नेताओं को सम्मोहित कर लिया जाता हैं ,अब पीड़ी बदल गयी हैं सोच बदल गयी हैं ,राजनैतिक स्वभाव और स्वाद बदल गया हैं ,हर कोई शोर्टकट लगाना चाहता हैं ,विचारधारा को कोई ढ़ोना नहीं चाहता ,भाड़ में जाए वो त्याग ,तपस्या और अहिंसा जैसे शब्द ….. गांधी होना कायरता का प्रतीक बन गया हैं जो संघ की गांधी के बारे में पुरातन परिभाषा हैं , हिंसा वादी तत्व अब सियासत का शास्त्र और अस्त्र बन गये हैं . लोकतंत्र की चादर में लिपटी मुर्दा जनता जो पता नहीं कोरोना से मरी या राह चलते चलते या फिर भारत और चीन की सीमा पर ? पता नहीं उनकी आत्माए सवालों के ज़बाब अंधेरी कोठरी में ढूंढ रही हैं

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

महात्मा गांधी या वो नेता होते जिन्होंने आज़ादी के लिए कुर्बानियां दी , शायद शर्म से मर जाते ,राजनीति का आधुनिक अनाचार देख कर लाचार और बेचारा अनुभव करते ,कुछ सत्ता के लालची नेता जिनको कम समय में गांधी परिवार की वज़ह से राजनैतिक व्यक्तितव के रूप में पहचान मिली ,आज वो सत्ता के शीर्ष पर बैठे नेताओं के साथ बैठा ठीक उसी तरह नज़र आते हैं जैसे किसी मायावी नारी ने धतूरा खिला अपना पालतू जानवर बना लिया हो .

राहुल गाँधी

क्या होगा ऐसे नेताओं का जिनकी विचारधारा को किसी भी माया से प्रभावित कर बदल दिया जाता हैं ? क्या महाराज सिंधिया अब सचिन पायलेट अब गोडसे जयंती पर गोडसे को श्रद्दांजलि देंगे ?…..या फिर नागपुर जा कर संघ परिवार का आशीर्वाद लेंगे ?

इसका उत्तर शायद इन नये सियासती कबूतरों के पास नहीं होगा क्युकी कांग्रेस ने इनको कभी कबूतर की तरह नहीं पाला , बाज़ की तरह पाला ,वरना पहले ही कबुतरो के पर काट दिए जाते हैं अब शायद भाजपा के कबूतर खाने में इन बाजों की परवरिश ,इनके पर कुतर कर की जायेगी ,सत्ता आयेंगी जायेंगी नेता आयेंगे जायेंगे लेकिन लोग कभी भी जयचंदों को नहीं भूलते और न ही सत्ता के लिए अपनी बोली लगवाने वाले नेताओं को ,जनता जानती हैं समय बड़ा कारसाज होता हैं ,परिवर्तन चक्र चलता रहता हैं , वर्तमान भविष्य और भविष्य भी कभी इतिहास बन शब्दों और घटनाओं में दर्ज हो जाता हैं

एक आम देशवासी और गांधी को अनुसरण करने वाला में और मेरे जैसे और भी होंगे ,जिनको संघ गांधी की फैलाई महामारी कहता हैं ,कायर और डरपोंक कहते हैं ,ये तो हमारे साथ तब भी हुआ था जब अंग्रेजो का शासन काल था अपने ही कुछ फिरंगी पुलिस की गोद में बैठ कर आज़ादी की चीखो का लुत्फ़ उठाया करते ,गांधी टोपी का मज़ाक उड़ाते थे , हम आज भी देश की राजनीति में स्वस्थ लोकतंत्र का समर्थन करते हैं ,जनता से अपील करते हैं ऐसे नेताओं को पहचाने जिन्होंने न्याय के लिए आपका मत लिया और अन्यायी दुराचारियो के साथ मिल गये ,

क्या आप इनको क्षमा कर पायेंगे ?

हम तो नहीं कर पायेंगे

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