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जय श्री राम की उग्रता में डरा सहमा लोकतंत्र और गांधी वाद

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सहमा हुआ

भयभीत अपने ही साए से

कही अपने चेहरे को आईने में देखने से डरा सहमा लोकतंत्र एक अँधेरे कोने में एक फटी मैली गांधी की चादर से अपने को ढकने की नाकामयाब सी कोशिश में लगभग पराजित मुद्रा में ,आत्मसमर्पण की मुद्रा में आ गया हैं |

भारत एक महान  देश आर्यवर्त बनने की राह पर एकाकी चल निकला हैं . एक ऐसी परिकल्पना जहाँ सब कुछ सुनेहरा हैं .साफ़ हैं स्पष्ट हैं . कोई भी गरीब नहीं हैं देश के प्रति समर्पित नागरिक जिनको अपने कर्तव्य का भान हैं . रामराज जैसा सुखद राज्य जहाँ सीता के मान अपमान की किसी को फ़िक्र नहीं बस मर्यादा और धर्म की सही परिभाषा …..

कब क्यों किसलिए ऐसा हो जाएगा ?

एक विचारणीय विषय हैं सबके लिए ,मनीषी हो या राजनीति के समर में शब्दों के शस्त्र ले कर उतरने वाले नेता ,जिन्होंने गांधी टोपी को एक राजनीतक कवच बना लिया था और उसी को शस्त्र बना कर अपना हित साधते रहे.

बड़ी बड़ी सर्वे एजेंसिया चुनावों के सर्वे ,बड़ी बड़ी बहस टी वी चेनलो पर वातानुकूलित भवनों में बैठ कर होते रहे .लेकिन hindi भाषी राज्यों में गोडसे की लू ने गांधी वाद के पानी को लोगो के लहू से निचोड़ डाला . एक असुरक्षा ने संघ को फलने और फूलने का भरपूर मौका दिया . कांग्रेस और विपक्षी दल केवल गांधी नेहरु और लोहिया की दुहाई देते रहे . किसी भी नेता में इतना माद्दा नहीं था की वो खुद को आत्मविश्वास के साथ देश के सामने प्रस्तुत कर पाता…..

सच और वास्तविकता बहुत भयानक हैं ,जहाँ एक तरफ ई वी एम् पर जंग छिड़ी हैं ,तब दूसरी ओर कोई भी नेता वास्तविकता का आइना देखना नहीं चाहता ,हास्यापद बड़ी बात ये हैं की कभी गांधी नेहरु और इंदिरा गांधी के फ़साने और गाना गाने वाले लोग अब खुद संघ की शरण में जा कर अपना भविष्य तलाश करने लगे हैं .जिस पर राष्ट्रवाद का तिलक लगा वो अपने आप को धन्य समझने लगे हैं .

सामाजिक परिद्रश्य को समझे बिना राजनीति की बात करना नौसीखिये गवार बिना समाज को जाने और हालात को जाने अपने नारों को रंग देने की कोशिश करने लगते हैं .अपने आपको राजनैतिक स्नातक कहने वाले कथित राजनैतिज्ञ अपनी सफ़ेद कड़क कलफ लगे कुर्ते पजामे में ही इतराते रहते हैं .बस काल्पनिक गाँधी वाद का हुक्का खुडखुडा कर वातावरण में एक असफल सी कोशिश करने में लगे रहते हैं बिना ये जाने की आसमान का रंग कभी केसरिया कभी गुलाबी हो चला हैं . रघुपति राघव राजा राम का भजन अब धीमा तो क्या उसकी फुसफुसाहट भी कही सुनने को नहीं मिलती .राष्ट्रवाद के नारों के बीच स्वातंत्रय की गाथाओं की जगह अब संघम शरणम् गच्छामि ने ले ली हैं .

वास्तविकता से दूर एकतारे पर कुछ लोग गांधी के नाम का भजन बहुत बेसुरा हो कर गाने लगे हैं .इस उम्मीद में की शायद भला हो जाए लेकिन जय श्री राम के नारे की उग्रता के बीच गांधी भजन की ध्वनी मंद हो जाती हैं . शांति अहिंसा का विश्व को सन्देश देने वाले महात्मा गांधी अप्पने ही देश में बेगाने से हो चले हैं .

अब गांधी के हे राम ! हे राम ! को जय श्री राम का नारा लगाने वाली भीड़ ने एक हिंसक नारा बना दिया हैं . संवेदना कही पीछे छूट गयी हैं . अब सहन शील हिन्दू असहनशील  और भीरु से वीर बन चूका हैं . जो इसी में खुश हैं की उसके नाम से गांधी नाम के एक अहिंसक संत का टेग मार्क हट गया हैं . या यूँ कह ले की कायरता का ठप्पा हट गया हैं .

आज़ादी गांधी की अहिंसा ने नहीं भगत सिंह और चन्द्रशेखर और सुभाष चन्द्र बोस की उग्रता और आक्रामकता ने दिलाई,अगर गांधी नहीं होते तब आजादी शायद 1857 में ही मिल गयी होती गांधी जी ने लेट कर दिया अपनी अहिंसा वादी बातो और आदर्शो को ले कर ?

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