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मोहन भागवत ने क्यों बताया आज़ादी आन्दोलन में कांग्रेस का बड़ा योगदान

संघ का पक्ष रखने के लिए ,बहुत सी बाते भागवत जी ने बोली और संघ के ऊपर लगे प्रश्न चिन्हों को मिटाने की असफल कोशिश भी की मसलन ये कहा कर की सरकार का रिमोट संघ् पास नहीं ....

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संघ प्रमुख भागवत के ताज़ा ब्यान से राजनैतिक गलियारों में एक नयी चर्चा को स्थान मिल गया हैं . संघ का दिल्ली के विज्ञान  भवन में आयोजित एक सम्मलेन जिसमे विभिन्न राजनैतिक दलों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया गया . संघ का पक्ष रखने के लिए ,बहुत सी बाते भागवत जी ने बोली और संघ के ऊपर लगे प्रश्न चिन्हों को मिटाने की असफल कोशिश भी की मसलन ये कहा कर की सरकार का रिमोट संघ् पास नहीं ….

संघ एक अलग तरह का संगठन हैं . संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा की आज़ादी आन्दोलन में कांग्रेस की बड़ी भूमिका थी . इतना कह कर उन्होंने अपनी स्वीकार्यता को बढाने की कोशिश भी की ….

कांग्रेस के नेताओं ने इस पर जल्दी से कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की . संघ का इतिहास रहा हैं कांग्रेस के नेताओं के चरित्र और उनकी दिव्यता का लाभ लेने की कोशिश करता रहा हैं . चाहे संघ में बापू महात्मा गांधी के आने का विषय रहा हो . ऐसे विषयों पर वो अपनी तरफ से भ्रामक झूठ के जाल बुनता रहा हैं कुछ इस तरह से की उसकी स्वीकार्यता और ज्यादा हो सके .

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आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ की संघ को इस सम्मलेन में अपनी सफाई देनी पड़ रही हैं . एक अनुमान हैं की कही इसके पीछे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का अपने यूरोप दौरे के समय दिया गया वो ब्यान हैं जिसमे संघ की तुलना राहुल गाँधी ने मुस्लिम ब्रोदर हुड से की थी . मुस्लिम ब्रोदर हुड वो संगठन जो आतंवादी घोषित कर खुद इस्लामिक देशो ने अस्वीकार कर दिया था .

राहुल गाँधी के ब्यान ने जैसे तोते की गर्दन पर वार किया था . जिसकी चोट संघ पर लगना  स्वभाविक था . राहुल गाँधी का ब्यान भले ही भारतीय मीडिया में सरकारी दबाब के चलते चर्चा का विषय न बना हो ,लेकिन अन्तराष्ट्रीय स्तर पर एक बड़ी चर्चा को जन्म दे गया था . संघ की अब अपनी बारी थी की वो कैसे इससे छुटकारा पाए .

जाहिर हैं उसे कुछ न कुछ ऐसा करना ही था ….

संघ के इस सम्मलेन को देख कर पञ्च तंत्र की एक कहानी याद आयी . उस कहानी में जंगल का निर्दयी शेर जिससे जंगल के सब जानवर खौफ खाते थे . वो जब बूढा हो गया उसका शरीर उतना फुर्तीला नहीं रहा ,शेर के भूखो मरने की नौबत आ गयी . क्युकी सब जानवर उसका स्वभाव समझ गए थे की वो धोखे से बुला कर शिकार कर अपनी भूख मिटाता था .

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एक दिन शेर ने सन्यासी का रूप धारण कर जोर से ईश्वर के भजन प्रार्थना गाने लगा . जंगल में रहने वाले दुसरे जानवरों को ये देख बहुत अचम्भा हुआ . उसने कहाँ शुरू किया की वो अब शाकाहारी हो गया हैं उसने संन्यास ले लिया हैं . अब बो कभी जीव हत्या नहीं करेगा . पहले तो जंगल में रहने वाले सीधे सादे प्राणियों को उस पर विशवास नहीं हुआ पर उसका अभिनय और ढोंग इतना सशक्त था की कुछ दिनों बाद उस पर जंगल के जानवर भरोसा करने लगे .

अब उससे कोई भय नहीं खता तब उसके आस पास मौजूद रहते उसकी सेवा करते . पर एक वानरराज को उसकी बातो में संदेह नज़र आता था . उनका संदेह यकीन में जब बदला जब जंगल में रहस्मय तरीके से जानवर गायब होने लगे . उसने अपने ख़ुफ़िया तरीके से जांच पड़ताल की तब पाया . ढोंगी शेर सन्यासी के रूप में उनका शिकार कर उन्हें खा रहा था .

वानर राज ने ये बात सबको बताई और जानवरों को सबूत भी दिए तब जा कर उस सन्यासी शेर का पाखंड उजागर हुआ और जंगल के जानवरों को उससे मुक्ति मिल पायी .

कहानी का सार अपने आप में संघ की विचारधारा पर सीधा प्रहार करता हैं . आज उसी तर्ज़ पर संघ प्रमुख कांग्रेस की प्रशंसा कर अपनी स्वीकार्यता को आगे ले जाने के विचार में हैं .

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