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बसपा सुप्रीमो मायावती के ब्लेकमेल की भेंट चढ़ जाएगा महागठबंधन का सपना

आज राज्यसभा के हुए चुनाव में भाजपा समर्थित जेडीयू के प्रत्याशी चुनाव जीत गए . संख्या बल मे और जोड़ तोड़ में भाजपा ने अपने हिसाब से प्रत्याशी को जीता दिया .

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आज राज्यसभा के हुए चुनाव में भाजपा समर्थित जेडीयू के प्रत्याशी चुनाव जीत गए . संख्या बल मे और जोड़ तोड़ में भाजपा ने अपने हिसाब से प्रत्याशी को जीता दिया . यहाँ ये गौरतलब होगा की भाजपा ने अपना कोई उम्मीदवार खड़ा नहीं किया था . इसके लिए सोचे समझे तरीके से उन्होंने जनता दल के प्रत्याशी को खड़ा किया और नितीश कुमार के सहारे कई भाजपा विरोधी दलों का समर्थन मत हासिल करने में कामयाब हो गए .

इससे पहले आम आदमी पार्टी के नेता राज्य सभा सांसद संजय सिंह के एक वक्तव्य ने आने वाले लोकसभा चुनावों के महागठबंधन पर प्रश्न खड़े कर दिए . उन्होंने कहा की कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने केजरीवाल को फोन ही नहीं किया ,ऐसे में हम उनका समर्थन क्यों करे . जब वो ही आगे आ कर झुकना नहीं चाहती तब हम क्यों समर्थन करे . यहाँ ये जानना ज़रूरी होगा की नितीश कुमार ने अरविन्द केजरीवाल को फोन कर समर्थन माँगा था .

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संजय सिंह का आरोप और शिकायत ये भी थी जो नेता अपने प्रत्याशी के लिए वोट नहीं मांग सकता वो महागठबंधन कैसे चलाएगा ?

संजय सिंह जैसा ही कुछ हाल बुआ जी का भी लग रहा हैं . मायावती एक बार फिर से कांग्रेस को अपने जाल में फांस कर दुसरे राज्यों में लोकसभा की सीटों पर अपनी बिसात फैलाने के फेर में हैं . लब्बो लुआब ये की कांग्रेस की जिम्मेवारी हैं की वो सबको साथ ले कर चले . सभी के निजी स्वार्थ पूरे करते हुए . भाजपा का भय दिखा कर कांग्रेस को ब्लेकमेल पर बसपा अब उतर आयी हैं .

मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान विधानसभा चुनाव में बसपा ने हैसियत से ज्यादा सीट मांग कर कांग्रेसी वार्ताकारों को पसोपेश में डाल दिया है. बसपा के अतार्किक हठ के कारण कई दौर की बातचीत अभी भी अधर में फंसी हुई है.

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आज के समय में बसपा के कई महत्वपूर्ण व वरिष्ठ नेता उससे अलग हो चुके हैं और बसपा उत्तर प्रदेश में ही वजूद बचाने के संकट में फंसी हुई है. बसपा की वर्तमान राजनीतिक हैसियत लोकसभा में शून्य और उत्तर प्रदेश विधानसभा में तीसरे दल की रह गई है. फिर भी वह संगठन व नेता विहीन मध्यप्रदेश समेत तीनों चुनावी राज्यों में सभी सीटों पर अकेले लडऩे की बात कर रही है जो अपने आप में हास्यास्पद है.
सूत्रों की मानें तो बसपा एक सोची समझी रणनीति के तहत दबाव बनाने के प्रयास में लगी है. वर्तमान राजनीतिक हालात में वह कांग्रेस को अपनी अव्यवहारिक शर्तों पर झुकाने के प्रयास में है. जबकि कांग्रेस राष्ट्रीय राजनीति को ध्यान में रखकर उसके कई शर्तों को पहले ही मानने को तैयार हो गई है लेकिन अभी भी बसपा ज्यादा से ज्यादा सीट लेने के फिराक में लगी हुई है.
कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि लोकसभा चुनाव में एकजुटता का हवाला देकर बसपा मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ व राजस्थान में गैरवाजिब दबाव बनाने का प्रयास कर रही है. जबकि सच्चाई यह है कि बसपा प्रमुख मायावती मुख्यमंत्री रहते हुए किसी भी राज्य में विपक्ष का दर्जा पाने की हैसियत नहीं पा सकीं.

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राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि उक्त प्रदेशों में भाजपा व कांग्रेस के बीच होने वाले आमने-सामने की लड़ाई में बसपा,सपा या अन्य छोटे दलों को कुछ खास हासिल होने वाला नहीं है. क्योंकि उत्तर प्रदेश में सत्तारूढ़ रहनेे के बाद भी बसपा मध्यप्रदेश समेत तीनों चुनावी राज्यों में अपने दम पर एक बार सिर्फ मध्यप्रदेश में ग्यारह सीट जीतने में कामयाब हुई थी उसके बाद आज तक कभी भी दहाई की आंकड़ा पार नहीं कर सकी है. ऐसे में न सिर्फ बसपा का दावा खोखला है बल्कि दबाव बनाने का आधार ही आधारहीन है.

मायावती को कांग्रेस से फायदा हो सकता हैं परन्तु मायावती से कांग्रेस को कुछ भी मिल पाना मुश्किल . मायाबती के पर्स के किस्से इतने मशहूर हैं की दलित युवा का उनके प्रति वफादार रहना संदिग्ध हैं , मायावती एक बार फिर से कांग्रेस के जरिये अपने आधार को मज़बूत करने का सपना देख रही हैं . भाजपा और संघ से मायावती की नजदीकिय जग ज़ाहिर हैं . ऐसे ही क्षेत्रीय दलों की महतवाकांक्षा महागठबंधन के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं .

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अखिलेश यादव भी कह चुके हैं उत्तर प्रदेश बड़ा राज्य हैं . उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अस्तित्व को वो नकार चुके हैं . असलियत इसके अलग दूसरी हैं अगर कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अकेले ही चुनाव लादे तब राष्ट्रीय दल होनेके नातयूसको कामयाबी मिलने की संभावनाए ज्यादा .

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