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शब्दों का नाद तांडव में बदल गया और उसके सीने का माप बस फूलता गया .

मोदी मोदी मोदी शब्दों का झंझावत ,एक नाद उठता हुआ उस नाद में सीना फुलाए एक बोलता हुआ नेता ,जैसे जैसे शब्दों का नाद तांडव में बदल रहा था सीने का माप बस फूलता जा रहा था

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मोदी मोदी मोदी शब्दों का झंझावत ,एक नाद उठता हुआ उस नाद में सीना फुलाए एक बोलता हुआ नेता ,जैसे जैसे शब्दों का नाद तांडव में बदल रहा था और उसके सीने का माप बस फूलता जा रहा था . चमकदार कोट पर बारीक सी सोने की कढाई पर अपनी तिरछी नज़र डाल जनसमूह की तरफ खुद पर आत्म मुघ्ध एक व्यक्तित्व ,अपनी विराटता के बोझ में दबा हुआ एक नेता जिसके समर्थक उसे भगवान् कहने लगे थे .

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इतना भी दुष्कर नहीं रहा था उसके लिए यहाँ तक का सफ़र एक संघ प्रचारक से ले कर मुख्यमंत्री और वहां से दिल्ली का तख़्त , कभी अपने आदर्श नेता के आगे माइक पकड़ कर खड़ा होने वाला आज पी एम् बन जाने के बाद चमक दमक से लवरेज कैमरों की फलश लाइटों के सामने अपने आपको चाय वाला कह रहा था .वो दिन में पोशाके दसियों बार बदलता और सत्ता के मद में चूर हो ,सत्ता के लिए सूबों में बस एक ही परिवार के बारे में अनर्गल बोलता .धर्म उन्मादी उसकी हर बात पर तालिया  बजाते . तर्क का उत्तर उनके पास अपशब्दों और आरोपों के अलावा कुछ न होता .

सत्ता अब बदल गयी थी .सत्ता पाने से पहले वो देश के लिए घातक बताता था . वो योजनाये लागू करने में उसे ख़ुशी हासिल होती आखिर सत्ता तक का सफ़र उसने गुजरात की रक्त रंजित सड़क के ऊपर चल कर जो किया था .कैसे ये मौका जाने देता अपने नाम को इतिहास के पन्नो में दर्ज करा सकने की उसकी महत्वाकांक्षा उसे कुछ न कुछ प्रयोग करने को उकसाती रहती . सत्ता बदली तब सवाल पूंछने वाले या उसके फैसलों पर सफाई अगर  कोई मांगता ,वो या तो सत्ता के तीसरे नेत्र का शिकार हो जाता या उसके उन्मादी समर्थक ,उसे काल का बोध करा देते .

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लोकतंत्र लाचारी से अपनी बेबसी पर कोने में खड़ा ,धुंधले पड चुके भाई चारे के आइने  में अपनी सूरत भी सही तरह से नहीं देख पाता . वो अहिंसा की बात करता कही न कही हिंसा अपने पूरे उनमान पर होती . वो राष्ट्रवाद का जिस दिन नारा लगाता उस दिन सरहद पर सैनिक शहीद हो जाते . वो गरीबो की बात करता ,किसान खुद अपने प्राणों का दान उसकी महान सत्ता को दे जाते .

वो अट्टहास लगाता हुआ ,सत्ता के मद में चूर हो रोज अपनी छाती का नाप लेता .दौलतमंदो के लिए तार तार हो चुके संविधान के सफ़ेद पर्दों की जगह उसने अपने दरबार में धर्मोन्माद से भरे रेशमी पर्दों के बीच ,उनके लाये महंगे आईने में अपने को घंटो निहारता हुआ अपनी भाव भंगिमाओ और अभिनय का अभ्यास करता हुआ नये नये जुमले रोज बनाता और रोज़ मिटाता .

उसके महल की प्राचीरो पर अब सफ़ेद परिंदो ने बैठना बंद कर दिया था . उनकी जगह कोओं और गिद्धों ने ले ली थी . इनको कोई सफ़ेद परिन्दा दिखाई भी देता तो वो खुद ही इनके भय से सुरक्षित ठिकाने की तलाश में अपनी जान बचा कर भागता .

लोकतंत्र की कलम के लिए स्याही खत्म होने लगी थी . स्याही केवल उनके पास थी जो उसका गुणगान दिनरात करते ,उसके गलत को भी सही बताते . लोकतंत्र के सिधान्तो की हरी भरी रंग बिरंगे फूलो से खिली क्यारियों पर मडराने वाली इतराती रंग बिरंगी तितलियों की जगह केवल भगवा रंग की तितलियों को ही जिंदा छोड़ा गया था विपक्ष के शोर को उत्सव के डी जे के तेज़ स्वर में दवा दिया जाने लगा . हर सूबे में कही राष्ट्रवाद तो कही राम राम खेला जाने लगा .

देश वासी और देश की गौरवशाली गंगा चार साल से वैसे ही बहती रही और मैली और मैली होती रही जैसे चार वर्ष पहले थी . गंगा पुत्र को जैसे सत्ता के आसन ने मोह लिया था अपने आपको योगी कहने वाला गंगा पुत्र योग  भूल भोग की लालसा में अपने मित्रो के भेजे महंगे रथ में अपनी विजय यात्रा जो कर रहा था .

क्रमश:

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