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जयललिता जी की तरह करुणानिधी को भी मिले सम्मान : राहुल गाँधी

अन्नाद्रमुक सरकार के इनकार के बाद उत्पन्न विवाद के बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने  ने आज रात अपील और निवेदन किया  कि द्रमुक प्रमुख भी दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता की तरह ही वहां जगह पाने के हकदार हैं.

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अन्नाद्रमुक सरकार के इनकार के बाद उत्पन्न विवाद के बीच कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने  ने आज रात अपील और निवेदन किया  कि द्रमुक प्रमुख भी दिवंगत मुख्यमंत्री जे. जयललिता की तरह ही वहां जगह पाने के हकदार हैं. गांधी ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि दुख की इस घड़ी में तमिलनाडु के मौजूदा नेता ‘‘उदारता’’ का परिचय देंगे.
राहुल गाँधी ने ट्वीट किया

जयललिता जी की भांति ही कलैनार भी तमिल जनता की आवाज थे। उस आवाज को मरीना बीच पर जगह पाने का हक है। मुझे विश्वास है कि तमिलनाडु के मौजूदा नेता दुख की इस घड़ी में उदारता का परिचय देंगे।’’

मरीना बीच पर करुणानिधि को दफनाने के लिए सरकार द्वारा जगह नहीं दिए जाने से उत्पन्न विवाद के बाद गांधी ने यह ट्वीट किया.

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यहाँ गौरतलब हैं की करुणानिधि का मंगलवार शाम 94 साल की उम्र में निधन हो गया. करुणानिधि के निधन के साथ ही तमिलनाडु समेत पूरे देश में शोक की लहर है. राज्य में एक दिन का अवकाश और सात दिन का शोक घोषित किया गया है. करुणानिधि के निधन की खबर आते ही डीएमके समर्थक सड़कों पर रोते और बिलखते नजर आए.

करुणानिधि के निधन के बाद उनको दफनाने को लेकर भी विवाद हो गया है. करुणानिधि की पार्टी और उनके समर्थकों ने मांग की है कि उन्हें चेन्नई के मशहूर मरीना बीच पर दफनाया जाए और उनका समाधि स्थल भी बने. लेकिन तमिलनाडु सरकार ने ऐसा करने से इनकार किया है. इसी को लेकर आज सुबह मद्रास हाईकोर्ट में सुनवाई हुई.

कोर्ट में सुनवाई के दौरान तमिलनाडु सरकार ने डीएमके की मांग के खिलाफ हलफनामा दिया है. सरकार की ओर से कहा गया है कि हमने दो एकड़ जमीन और राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार करने का वादा किया है.

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एम करुणानिधि के निधन के बाद दक्षिण भारत की राजनीति में एक युग का अंत हो गया हैं . करीब 60 सालों तक दक्षिण भारतीय राज्य तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय रहे करुणानिधि के जाने के बाद अब सवाल उठता है कि वो जो अपने पीछे एक बड़ी और प्रभावी राजनीतिक विरासत छोड़ गए हैं उसका वारिस कौन होगा.

हालांकि करीब दो साल पहले करुणानिधि ने काफी विवादों के बाद साल 2013 में अपने बेटे एमके स्टालिन को अपना राजनीतिक वारिस घोषित कर दिया था लेकिन जब तक वो जीवित रहे द्रविड़ मुनेत्र कडगम (डीएमके) पर अपनी पकड़ बनाए रखी.
हालांकि करुणानिधि की दूसरी पत्नी से उनके बेटे अझागिरी और स्टालिन में सत्ता संघर्ष और पार्टी पर कब्जे की लड़ाई घर से लेकर सड़कों तक पर नजर आई

लेकिन डीएमके प्रमुख खुद इस संघर्ष को खत्म करने की कभी न खत्म होने वाली कोशिश करते रहे.
करुणानिधि अपने बेटों के बीच संघर्ष को अच्छे से जानते थे इसलिए बीते साल जनवरी में उन्होंने स्टालिन को पार्टी का कार्यकारी अघ्यक्ष तो नियुक्त कर दिया लेकिन पार्टी सुप्रीमों की कमान अपने ही हाथों में रखी ताकि पार्टी में कोई फूट ने पड़े.

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