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आम आदमी का राहुल गाँधी पर निशाना या तीसरे मोर्चे की सुगबुगाहट

सियासत में समझौते  तोड़ देना सत्ता के लिए आम बात होती हैं . सियासत में रिश्ते बनते और बिगड़ते खूब देखे ह्गाये हैं . सत्ता के लिए आंदोलनकारियो को जो कभी सत्ता सुख से दूर रहने की बात करते थे .

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सियासत में समझौते  तोड़ देना सत्ता के लिए आम बात होती हैं . सियासत में रिश्ते बनते और बिगड़ते खूब देखे ह्गाये हैं . सत्ता के लिए आंदोलनकारियो को जो कभी सत्ता सुख से दूर रहने की बात करते थे . उनको सत्ता के केंद्र विन्दु में नेता बनते हुए भी देशवासियों ने देखा हैं . जहाँ एक तरफ महागठबंधन की बात हो रही हैं .

वहां आम आदमी पार्टी ने एक कांग्रेस विहीन मोर्चे की बात कह कर एक बड़ा सियासी दांव खेल दिया हैं . या यूँ कहा जाए तो गलत नहीं होगा की एक अवसर वादी महागठबंधन की अन्दर खाने तैयारी चल रही हैं . जिसके बारे में अभी कांग्रेस को अंदेशा तक नहीं हैं .

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कांग्रेस के साथ फिर से उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में ,सपा की शर्त पर किये गए गठबंधन की तरह अब लोकसभा के चुनावों में ऐसी ही कुछ सियासी जाल  बिछाने की तैयारी हो रही हैं . जिसके बारे में कांग्रेस के बड़े रणनीति कारो को अंदेशा भी नहीं हैं . वो अपनी झांझ में गठबंधन का नारा दांत भींच कर लगा रहे हैं .

इस तीसरे अवसर वादी मोर्चे में बीजू जनता दल ,ममता बनर्जी नितीश कुमार ,अरविन्द केजरीवाल .मायावती .सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ,और भाजपा के कुछ असंतुष्ट नेताओ समेत शिवसेना के अलावा और भी दल इसमें शामिल रहेंगे . कांग्रेस को अंत तक भुलावे की स्थति में रखा जाएगा और एक वक्त पर साथ छोड़ने की धमकी दे ज्यादा से ज्यादा कांग्रेस से उसका सियासी स्पेस हडपने की कोशिश होगी .

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कांग्रेस को भी अपने पास विकल्प खुले रखने होंगे खाली महागठबंधन की तरफ से निश्चिन्त हो कर .

कांग्रेस या किसी भी पार्टी का केडर उसके विराट स्वरुप पर निर्भर करता हैं . कांग्रेस को ठीक वैसी ही कोशिश करनी होगी . बसपा और सपा कभी भी अपना सियासी स्पेस कांग्रेस को देना पसंद नहीं करेंगे क्युकी उनको पता हैं की कांग्रेस ही इन दोनों क्षेत्रीय दलों का विकल्प हैं . कोई भी राजनैतिक दल अपने विकल्प को मज़बूत नहीं देखना चाहेगा . ममता बनर्जी भी अपना बंगाल नहीं छोड़ेंगी उन्होंने वहां से सभी सीटे जीतने का दम भरा हैं . उन्होंने भी स्पष्ट नहीं किया की वो कांग्रेस को कितनी सहभागिता देना पसंद करेंगी .

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बीते कल हुए घटना कर्म ने उपसभापति के चुनाव बाद बड़े संकेत दिए हैं . आम आद्मी पार्टी का सीधे कांग्रेसाध्यक्ष पर निशाना साधना और नितीश कुमार के फोन आने की बात करना , और मतदान से बाहर रहना ,कांग्रेस के महागठबंधन में शामिल होने वाले सहयोगी सांसदों का अनुपस्थित रहना नये सियासी घमासान और भाजपा की नयी कूटनीती की आहट हैं .

महागठबंधन में अधिकतर वो राजनैतिक दल हैं जिन्होंने कांग्रेस विरोधी राजनीति की हैं . कांग्रेस का एक बड़ा सियासी स्पेस छीना हैं वो फिर से ज्यादा जगह देने में हिचकेंगे . जब कांग्रेस का विस्तार नहीं होगा तब उन पार्टियों का वोट कैसे मिल पायेगा ?

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