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देश और विदेश में राहुल गाँधी के बढ़ते प्रभाव से मोदी सरकार में छाई बैचैनी

अब राहुल गांधी के राजनीतिक प्रहारों और तीखे अंदाज़ में भाजपा के फैसलों के ऊपर नपे तुले अंदाज में बार  से जिस तरह भाजपा में बैचेनी दिखाई देने लगी हैं .

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अब राहुल गांधी के राजनीतिक प्रहारों और तीखे अंदाज़ में भाजपा के फैसलों के ऊपर नपे तुले अंदाज में बार  से जिस तरह भाजपा में बैचेनी दिखाई देने लगी हैं .

उससे कांग्रेस अध्यक्ष की भूमिका में राहुल गांधी के नए रूप और नए तेवरों का पता चलता है. राहुल गांधी के एक प्रहार पर जिस तरह भाजपा के समूचे नेता प्रैस वक्तव्य और टी.वी. चैनलों के सामने राहुल गांधी पर प्रहार करने के लिए एकजुट हो जाते हैं, उससे कांग्रेस कार्यकओं में न केवल नई ऊर्जा का संचार हो रहा है बल्कि देश की जनता यह स्वीकार करने लगी है कि राहुल गांधी उनके हित में मोदी सरकार की कलई  खोल  रहे हैं.

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इसमें कोई दो राय नहीं कि आज देश का युवा वर्ग भी राहुल गांधी के साथ जुड़ रहा है. देश हो या विदेश राहुल गाँधी भाजपा द्वारा निर्मित हर उस जाल को काट रहे हैं जो उनकी छवि को खराब करने के लिए रचा गया था . 21वीं सदी का नौजवान अब “जुमलेबाजी ” के संक्रमण से अपने आपको बचाए रखना चाहता हैं .

राहुल गांधी इन्हीं युवाओं की आशाओं का एक शक्ति पुंज के केन्द्र बनकर उभर रहे हैं. युवाओं के बीच उनकी लगातार निखर रही छवि का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि युवाओं में राहुल से मिलने और उनके साथ देश हो या विदेश सैल्फी खिंचवाने की होड़ शुरू हो गई है.

पिछले  वर्ष  अमरीकी दौरे के दौरान राहुल गांधी ने अपनी सोच से पूरी दुनिया को प्रभावित किया हैं .  वो सफ़र अब सिंगापूर से होता हुआ मलेशिया तक पहुच गया हैं . उनकी नई सोच ने देशवासियों के साथ-साथ पूरी दुनिया को अपनी ओर आकर्षित किया हैं .

राहुल गांधी एक वैचारिक परंपरा में पैदा हुए ऐसे नेता हैं जो मूल्यों की राजनीति में आस्था रखते हैं . वो अपनी सरकार के प्रतिबिम्ब में कभी नहीं दिखाई दिए . परन्तु पार्टी के अन्दर भ्रष्टाचार पर मुखर रहे . एक भी भ्रष्टाचार का किसी मंत्री पर यू पी ए के शासन काल में आरोप लगा . त्याग पात्र के लिए दबाब की भूमिका सबसे पहले राहुल गाँधी की होती थी . जिसको भाजपा ने उनकी “कम राजनैतिक समझ ” कह कर प्रचारित किया था .

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याद कीजिये यू पी ए के शासन काल में कलमाड़ी हो या राजा या फिर कनिमौझी ,केवल यू पी ए की सरकार ने गंभीर कार्यवाही की . ये एक तरह से आत्म घाती था . तब  भाजपा  ने मर्यादाओं को दोषी करार दे कर कुशलता को भ्रष्टाचार का नाम दे कर सियासती लाभ उठाया . आज भाजपा के कई मत्रियो पर गंभीर आरोप हैं .

क्या भाजपा यू पी ए  सरकार की तरह साहस रखती हैं ?

आज कई उद्योग पति सरकार की मिली भगत से बेंक घोटाला कर विदेशो में भारत सरकार को ठेंगा दिखा रहे हैं . किसी एक को भी वापिस नहीं लाया सका  हैं . ललित मोदी जो आई पी एल का घोटाले बाज़ हैं उसकी सिफारिश में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की चिठ्ठी का जिक्र खूब हुआ . ज़बाब देही तय करने में शक्तिशाली मोदी की सरकार असफल रही .

जबकी मनमोहन सरकार में सत्यम हो या सहारा श्री एक भी उद्योग पति को देश छोड़ कर नहीं जाने दिया गया था .

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यू पी ए सरकार मे राहुल गाँधी ने दागी सासदो का एक बिल फाड़ा था जिसको भाजपा इ तत्कालीन पी एम् ममोहन सिह के अपमान से जोड़ दिया था . मीडिया ने भी भाजपा के सुर में सुर मिला कर ऐसा हो हल्ला मचाया ,जनता का ध्यान  बिल क्यों फाड़ा ?

इस पर नहीं गया अपितु फोकस इस बात पर हो गया की तत्कालीन पी एम् का अपमान हो गया .

अगर वो बिल पास न हु होता तो आज सत्ता में भाजपा के साथ अपराधिक छवि वाले नेता नहीं होते .

राहुल गाँधी  चाहते तो  कभी भी यू.पी.ए. सरकार में देश की बागडोर कभी भी संभाल सकते थे लेकिन उन्होंने सत्ता के प्रति लालसा दिखाने की बजाय खुद को पार्टी के एक सिपाही के रूप में प्रस्तुत किया और अपनी ऊर्जा कांग्रेस पार्टी में नई जान फूंकने में लगाई. अपने आप को राजनैतिक विद्यार्थी की तरह जिसमे अपने से अनुभवी नेताओं से सीखने की उद्दांत इच्छा थी .

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