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सियासत के सिमटते,फैलते ,बदलते दायरे ,राहुल गाँधी बनाम मोदी

राहुल गाँधी के आगे बौना व्यक्तित्व जुमले बाज़ मोदी का

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इतिहास के झरोखे से

ज़रा दिल थाम कर दास्तां सुन लीजिए . संघ के चरित्र की यहाँ आज भी औरंगज़ेब के सिद्धांतों का पालन करने वाले नेता हैं .

जिसने अपने पिता को ही बंधक बना लिया था . दारा शिकोह का सर हाथी से कुचलवा दिया था .

दींन दयाल उपाध्याय हो या संजय जोशी संघ के इतिहास में ऐसे ही कुछ पात्र रहे हैं .

दींन दयाल उपाध्याय उदार वादी रहे थे समय समय पर उन्होंने तब की तत्कालीन कांग्रेस सरकारों के फ़ैसलों को अपना समर्थन दिया था .

हत्या आज भी रहस्य के अँधेरे में हैं .

किसी भी संगठन के नेता अपने नेताओं से प्रभावित हो उसी विचारधारा और राजनैतिक पैतरे को अपनाते हैं .

जो उन्होंने सीखा होता हैं .

कुछ दिन हुए इस नवंबर के महीने मैं ,जो भी सन  2017 चल रहा हैं .

एक ऐसे नेता को बनारस के घाट पर उसके जन्म दिन पर नितांत एकाकी बैठे देख ,वर्तमान भारत की राजनैतिक दुर्दशा पर रोने का मन करने लगा .

मानवीय स्वभाव हैं संवेदनशील होना राजनैतिक विचारधारा भले ही अलग हो ,लेकिन कांग्रेस नेताओं ने हमेशा विपक्ष को मांन  दिया हैं . मज़ाक उड़ाने के बारे में सोच नहीं सकते .

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महात्मा गाँधी ने कांग्रेस के खून और डी एन ए में उस विचारधारा को बहुत गहराई से इंजेक्ट जो कर दिया हैं .

“वो निस्पृह सा बनारस के गंगा घाट पर अपने जन्मदिन पर अकेला नितांत एकाकी था .
वो बनारस के घाट पर दियो की लौ के बीच सूर्यास्त होते देख रहा था .
इस एकाकीपन  में उसके कोई साथ था तो केवल उनकी पुत्री ,जो इस नितांत गंगा की लहरों की ध्वनियो के बीच उस सन्नाटे को दूर कर रहे थे .”

वो नेता जिसने वर्तमान भाजपा की पार्टी के डी एन ए की नीव रखी थी .

उन विष से भरे संपोलो को पैदा किया था . जो उसके कमाए धर्म पर आज बेकाबू सांड की तरह विचरण कर रहे थे .

इंदिरा जी हो या स्व.प. नेहरू जी इन सबने एक लोकतांत्रिक राजनैतिक सन्देश दिया था .

विचारधाराओं के सम्मान का ,एक नयी ऊँचाइयों का

उनका मानना था की बहुसंख्यक विचारधारा भी देश की आवाज़ इसको लोकतंत्र में अधिकार मिलना चाहिए .

उन्होंने उस विचारधारा से प्रभावित हो इन दोनों नेताओं को सम्मान दिया . उनके लिए खाद का कार्य किया .

उर्वर जमीन हिंदुत्व की तैयार करने में आडवानी और अटल बिहारी वाजपेयी ने कसर नहीं छोड़ी .

अब यही से शुरू हुआ था वो विध्वंसक आन्दोलन जिसने उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में हिंदी भाषी राज्यों में एक विचारधारा का वर्ग एकजुट कर दिया .

नायक आडवाणी थे .

वो आडवाणी जब भी किसी रैली में उत्तर प्रदेश की जाते लोग उनके कदमों को छू भर लेना चाहते थे .

एक झलक पाने के लिए बेताब रहते थे . इन पलो का में खुद साक्षी रहा हूँ .

आज महानायक अकेला था .

गुजरात के नेता सरदार पटेल की चुनरिया ओढ़ कर राजनैतिक मुजरा पूरे देश को दिखा रहे हैं .

वो चुनरिया भी मेड इन चाइना हैं .

जिस नेता के संरक्षण में लाल कृष्ण आडवाणी अटल बिहारी वाजपेयी के विरोध में खड़े हो गए थे .

वो आज देश के प्रधानमंत्री हैं जो कभी आडवाणी जी का साउंड सपोर्ट सिस्टम ले कर चला करते थे .

भारतीय राजनीति का मिथक एक सुलतान नरेंद्र भाई मोदी ,वो जन्मदिन की शुभ बेला में साथ नहीं था .

मोदी के समर्थक आडवाणी के पाकिस्तान पर जिन्ना की मज़ार पर जाने पर सवाल उठाते हैं .

पाकिस्तान के पनामा पेपर के भ्रष्टाचारी पी एम् नवाज के यहाँ अचानक जाने पर कोई उत्तर नहीं देते .

वो लाल कृष्ण आडवाणी ही थे जिन्होनें एक बार हवाला काण्ड में नाम आ जाने पर त्यागपत्र दे दिया था .

भारतीय जनता पार्टी की शुचिता और जिम्मेदारी को बरकरार रखा था .

एक वर्तमान का विकास पुरुष हैं जो सत्ता के लिए कितने ही भ्रष्टाचारियों के सामने नतमस्तक नज़र आता हैं .

उसके लिए इस बात का कोई अर्थ नहीं की वो कितना भ्रष्टाचार में लिप्त हैं .

उसने हिंदुत्व की भट्टी पर सत्ता की कढ़ाई चढ़ा कर भ्रष्टाचारियों के साथ गठजोड़ का नया सत्ता का पकवान बनाने के ठानी हैं .

आइये अब एक दूसरा दृश्य देखते हैं 

आल इण्डिया कांग्रेस का वारिस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी और उनकी माँ जो अल्पसंख्यक सिख समाज को देश का नेतृत्व सौपती हैं.

उसका प्रचार नहीं करती .

प्रधानमंत्री पद के लिए एक नौकर शाह को चुनती हैं जो प्रोफेशनल हैं काबिल हैं देश के लिए ज्यादा अच्छा कर सकता हैं .

खुद प्रधानमंत्री नहीं बनते और न ही अपने बेटे को बनाती . यहाँ तक की कोई मंत्री पद भी नहीं. संगठन में काम करो .

राहुल गाँधी उस समय उपाध्यक्ष बन कर पार्टी में सक्रिय होते हैं जो कांग्रेस का सबसे खराब समय होता हैं .

ऐसे समय ही धैर्य और साहस की वास्तविक परीक्षा होती हैं .

वो नेतृत्त्व देते हैं उस समय जब सरकार अपने विरोध में चल रहे आंदोलन को झेल रही होती हैं .

जिसमें कुछ कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं की भी मिली भगत होती हैं .

बदलते राजनैतिक संस्कार 

वो सिर्फ मुस्कुराता हैं उनके गालो में पड़ने वाले डिम्पल चुनौतियों को स्वीकार करते नज़र आते हैं .

ग़ौर तलब बात ये हैं आज तक राहुल गाँधी हताश कभी नज़र नहीं आयें हैं . हार और जीत को उन्होंने हमेशा समान लिया हैं .

उनके और मोदी के राजनैतिक चरित्र का अंतर जब साफ़ दिखाई देने लगता हैं.

जब वो शक्तिशाली हो कर भी अपने वरिष्ठ नेताओं के साथ खड़े नज़र आते हैं .

चाहे वो कप्तान अमरिंदर सिंह हो या राजा वीर भद्र सिंह .

युवाओं को दर किनार कर उनको महत्व दे कर हिन्दू संस्कृति और बदलते राजनैतिक  संस्कारों का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करते हैं .

यही  तो कांग्रेस हैं बदली हुई सी हिंदुत्व के संस्कारों का पालन करती हुई .

उस हिंदुत्व का जिसमे बुजुर्ग को सम्मान दिया जाता हैं .

असली और कट्टर हिंदुत्व का उदाहरण कहाँ मिलेगा ?

राहुल गाँधी भूत पूर्व पी एम् को सीढ़ियां चढ़ने में सहायता के लिए उनको एक सहायक  की तरह सम्हाल कर ,सहारा दे कर ,उनके उत्तराधिकारी  होने का परिचय देते हैं .

ये गुण राजनीती में होते हुए सिर्फ राहुल जी का ही हो सकता हैं किसी और का नहीं .

राहुल गाँधी आडवाणी जी से भी मिलने पहुँच जाते हैं . प्रचार नहीं करते .

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