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क्या लोकसभा 2019 में चुनाव न हो कर राहुल गाँधी सहित युवा नेताओं की क्रान्ति होगी ?

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लोकसभा चुनाव का आगाज़ राज्यसभा के चुनावों ने तय कर दिया हैं .धनबल और सत्ता बल का दुरपयोग शायद ही पिछले दस सालो में देखने को मिला हो .

एक बार फिर से सोनिया गाँधी  मुखर हैं लगता हैं (young ) राहुल गांधी कही नेपथ्य में खड़े अकेले से नज़र आ रहे हैं .

अपने मज़बूत विचारों के साथ लेकिन एक सत्य के भी साथ जिस विपक्षी दल का देश के हिस्से में जहाँ ज्यादा प्रभाव उसे उस तरह से ही गठबंधन किया जाए .

शाह और मोदी की नयी रणनैतिक चाल  राहुल गाँधी (young )और सोनिया गाँधी जी को उन्ही के संसदीय क्षेत्रो में उलझाए रखने की होगी .

सोनिया गांधी आज अपने 18 सहयोगी दलो के साथ आने वाले समय में रणनीति क्या हो ,इस पर विचार कर रही हैं .

बिहार में राजग अपने मज़बूत और तेज़स्वी युवा तेवर में दिखाई दे रहा हैं.

नितीश कुमार की छवि अवसरवादी नेता के रूप में बिहार के अन्दर प्रतिस्थापित हो चुकी हैं .

वही ममता बनर्जी और अखिलेश यादव अपने अपने तेवरों और राजनैतिक धमक के साथ मौजूद हैं .दक्षिण में कांग्रेस स्टालिन के साथ जाना चाहेगी . जयललिता के बाद अब यह दल राजनैतिक रूप से कमजोर हुआ हैं .

कमल हासन और रजनी कान्त के दक्षिण में राजनीति में उतरने के कयास लग रहे हैं . ऐसे में बहुत मुमकिन हैं 2019 में चुनावों के झंडे भगवा के साथ साथ तिरंगे लहराते दिखाई दें .

गुजरात राज्यसभा चुनाव में भले ही बीजेपीअहमद पटेल को लाख प्रयासों  के बाद भी  हरा नहीं पाई हैं .

भाजपा के रणनीती

अब भाजपा  कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी को उनके ही गढ़ में घेरने का प्लान बना रही है.

मीडिया में आई खबर के मुताबिक बीजेपी इस बार प्लान बना रही है कि सोनिया गांधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली में इस बार शक्तिशाली  उम्मीदवार उतारा जाए.

इसकी एक वजह यह है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी की सीट अमेठी से स्मृति ईरानी ने उनको तगड़ी टक्कर दी थी और मतगणना के समय काफी देर तक ईरानी ने राहुल गांधी को पीछे छोड़ रखा था.

यह खबर उस दिन मीडिया  चैनलों की सुर्खियां बन गई थी. हालांकि बाद में राहुल गांधी ही जीते थे लेकिन जीत का अंतर पिछली बार की तुलना में कम  था.

 

young

राज्य में इस समय बीजेपी की ही सरकार है और योजना है कि दोनों संसदीय क्षेत्रों की जनता को यह समझाया जाए कि देश के वीवीआईपी जिले कही जाने वाली इन दो सीटों के इलाके में विकास उम्मीद के मुताबिक क्यों नहीं हुआ ?

अब राज्य सरकार के भरोसे बीजेपी वहां विकास के सपने दिखाएगी. हाल ही में अमेठी में राहुल गांधी के गुमशुदगी के पोस्टर लगाए गए हैं.

इसके साथ ही बीजेपी के कार्यकर्ता इस बात का भी समझा रहे हैं…

कि इतने साल से सांसद रहने के बाद भी राहुल गांधी अमेठी का विकास क्यों नहीं करा पाए हैं.

इस बार बीजेपी दोनों ही सीटों पर आक्रामक प्रचार करने की तैयारी में है .

इसके साथ ही हाईप्रोफाइल वाले उम्मीदवार भी उतारने की तैयारी में है.

अमेठी को छोड़ दिया जाए तो बीजेपी ने कभी भी रायबरेली में सोनिया गांधी के आगे बड़ा प्रत्याशी उतारने की हिम्मत नहीं दिखा नहीं सकी है. एक तरह से देखा जाए तो रायबरेली में बीजेपी समर्पण की मुद्रा में रही है.

कांग्रेस का दांव

भाजपा अगर ये नीति अपनाती हैं तब कांग्रेस को भी बड़ा दिल दिखाना होगा ऐसे दलों को भी साथ में लेना होगा जो अभी फल और फूल रहे हैं ,लेकिन रणनीतिक रूप में मोदी का सही करारी तोड़ हो सकती हैं .

विकल्प कई हैं मोदी को वनारस में ही उलझाने के लिए .

राजनैतिक विचारों और रणनीतियो के भवर में आम मुद्दे अभी से गायब होने शुरू हो गए हैं .

यदि महागठबंधन इस बार सही रूप में साकार होता हैं तब भाजपा भी इस बार अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पायेगी .

महागठबंधन में भी कांग्रेस के मुख्य  रूप से विश्वसनीय सहयोगी अखिलेश  यादव ,ममता बनर्जी तेज़स्वी यादव हो सकते हैं .

बाकी और दलो की प्रासंगिकता हो सकता हैं प्रदेश और समाज  के आधार पर हो लेकिन राम मंदिर मुद्दे पर वो कितना महागठबंधन को संजीवनी दे पायेंगे इसमें संशय हैं .

सवाल कांग्रेस का हैं जिस तरह का माहौल इस समय चल रहा हैं कांग्रेस को अकेले ही खड़े हो कर अपने विपक्षी दलों के साथ सम्मानजनक समझौते करने होंगे .

जिसकी वज़ह से इस बार भी उसका अपेक्षित वोट बेंक उस को वापिस मिल  पायेगा इस में संदेह नज़र आता हैं .

कांग्रेस के लिए रणनीति बनाते सोनिया गांधी और उनके साथ के नेता नज़र आते हैं .

राहुल गाँधी उन फैसलों में कितने शामिल इस का पता कार्यकर्ताओं को न चल पाने से भ्रम की स्थति जिसका लाभ भाजपा जम कर उठा रही हैं .

राहुल गाँधी के नेत्रत्व पर जितना ज़ल्द फैसला होगा उतना ठीक ,वर्ना कांग्रेस के कई युवा (young ) चेहरे इतिहास की धुल में गोते लगाते मिलेंगे .

कांग्रेस ये भय हैं की बूढी ही न रह जाए ?

कांग्रेस और आशंकाए

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जनसत्ता

एक परिपक्व ब्यान आया था कुछ दिनों पहले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंहजी का जिसमे उन्होंने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी को कांग्रेस की कमान सौपने की बात कही थी .

वो शब्द बस कुछ समय के लिए समय के पन्नो  पर शब्द बन कर ही अंकित हो गए हैं .

राजिस्थान ,मध्य प्रदेश ,महाराष्ट्र ,गुजरात और हिमाचल यहाँ फिर से कही कांग्रेस अपने पुराने चेहरों पर विशवास तो नहीं करने जा रही हैं ?

जहाँ कमजोर हैं वहां महागठबंधन के नाम पर कांग्रेस के साथ कोई और दल नितीश कुमार की तरह सत्ता के लोभ में पीठ पर नासूर न बना दे ?

भविष्य के राजनीतिक मंचन में युवा (young )  नेताओं से युक्त राजनीती पूर्ण व्यवहार कांग्रेस की व्यवहारिकता का परिचय देगी .जो एक धनात्मक सन्देश देश की जनता को होगा .

दक्षिण में डी एम् के कांग्रेस के सही साथी तो साबित होंगे लेकिन साथ लड़ेंगे तब हिंदी भाषी क्षेत्रो में कांग्रेस को इसका नुक्सान ही होगा . कुछ राजनिति दलों को साथ न ले कर सहयोग दे कर भी लड़ा जा सकता हैं .

भविष्य की राजनीती  में  अगुआ बनने के लिए ,युवा (young )चेहरे अखिलेश यादव ,तेज़स्वी यादव ,सचिन पायलेट ,दीपेन्द्र हुड्डा मध्य परदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया ,हार्दिक पटेल  ,कन्हैया कुमार जैसे युवा ही राहुल गाँधी के साथ मोदी का सही तोड़ साबित होंगे .

लोकसभा २०१९ का चुनाव वास्तव में चनाव न हो कर समग्र रूप से एक क्रान्ति का रूप ले सकता हैं .

जिसे युवा ही कर सकते हैं . अमित शाह और मोदी से सियासत में और उनके ढंग अपनाना कांग्रेस के बूते से बाहर साबित होगा .

इस बार के चुनावों में सरकार की हर मशीनरी का इस्तेमाल होगा . जिसके विरुद्ध नीती साथ में  मिल बैठ कर बनानी बेहतर .

 

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