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राहुल की नेहरूवियन राजनीति का विस्फोट और मोदी का संघ तंत्र : उम्मीद हैं गाँधी

pic by ayush mishr
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गोडसे जीत गया लगता हैं ,और आज गाँधी हार गया . कडवी कुछ यादें ये आने वाले दिन में बन जायेंगी . संघ के हाथ जाते देश को गांधी कर्तव्य विमूड सा हैं . न्याय पालिका से ले कर सरकार तक ऐसे लोगो के हाथो में जिन्होने कभी तिरंगे पर विश्वास नहीं किया . न किसी स्वतंत्रता आन्दोलन में भाग लिया . अपने हिसाब से आज देश की पालिसी विदशो और बड़े उद्योग पतियों के हित में बना रही हैं . ज्यादा आशावादी आज़ादी के बाद हमारे महान नेता भी नहीं रहे . नेहरूजी काल द्रष्टा थे . उन्होंने एक लेख के जरिये ये बताने की कोशिश की थी . आत्मानुशासन की …..

क्या हैं किसी में

आज भी नेता जो किसी भी राजनैतिक दल से वास्ता रखते हैं ,उनके पास अपना विबेक नहीं . ये आज स्पष्ट हो गया हैं की जितने भी हैं एक थैली के चट्टे बट्टे ,भ्रष्टाचार में सब एक दुसरे के साले और बहनोई हैं . वर्तमान समय में अगर इन दलबदलू ,और भ्रष्टाचारी नेताओं की और उन उद्योगपतियों की नज़र में एक ही सबसे बड़ा काँटा हैं राहुल गाँधी . जो स्वच्छता का नारा नहीं देता स्वच्छ राजनीती की बात कर अपनी ही कांग्रेस के नेताओ के षड्यंत्र का शिकार हैं . जिसे किसी भी दल का भ्रष्ट नेता एक प्रधानमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहता . जिसने दागी बिल फाड़ दिया एक प्रश्नवाचक चिन्ह उन नेताओं पर लगा दिया जिन पर भ्रष्टाचार के मामले थे . जाहिर हैं कुछ दागो में घिरे अपने भी थे . जिनके पेट में दर्द होने लगा . आख़री छोर पर खड़े कार्यकर्त्ता को टिकट देने वाले नेता को यह कह कर प्रचारित कर दिया गया की इसको राजनीती ही नहीं आती . वो इस फील्ड के लिए अनफिट हैं .

देश चल रहा हैं सेटिंग से ,जितना करप्शन के साथ समझौता जो कर ले ,विपक्षियो के यहाँ छापे डाल कर अपने को ईमानदार साबित कर दे . मीडिया को धनबल से अपने उद्योगपति मित्रो के द्वारा खरीद ले . वही तो सियासत का कामयाब खिलाड़ी हैं .

राहुल  गाँधी सत्य हैं . वो सत्य जिसकी इस देश को ज़रुरत ,साहब नेहरूजी के बाद अब तक सारे नेता सियासती ही मिले हैं वो अलग बात हैं इंदिराजी और राजीव गाँधी इसके अपवाद रहे . उन्होंने सियासत ज़रूर की लेकिन देश हित में ,समझौते कुछ अप्रिय किये लेकिन देश हित में . विदेश नीति में किसी को अपने ऊपर हाथ नहीं रखने दिया .सियासतों से पेट भर गया ,लेकिन आम जनता का पेट खाली हैं . और अब तो टेक्स इतना हैं की कफ़न भी टेक्स दे कर खरीदना होगा .

इसी तरह इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी सब विपक्षी दलों की आँख की किरिकिरी रहे . अंजाम क्या हुआ ?

हत्याए कर दी गयी .

खालिस्तान  को ले कर दबाब पंजाब में हिन्दुओ की रक्षा का किसने बनाया ?

सब जानते हैं अटल और आडवानी …

इंदिराजी पर स्वर्णमंदिर को ले कर दबाब बनाया गया . और भिंडरावाले को उनके द्वारा ही लाया गया बताया गया .

क्या in सब में आप सबको विरोधावास नहीं लगता ?

अकाली दल के साथ मिल कर सरकार किसने बनाई

आइये राजीव गाँधी की हत्या हुई जिनकी वज़ह से आज के युवा को कोई कम्पुटर कोर्स करने की ज़रुरत नहीं आज आठ साल का बच्चा मोबाइल से ही सब कुछ सीख गया हैं . उनको भी उनकी विदेश नीती के कारण भारत माता के लिए देश की एकता अखंडता के लिए बलिदान हो गए .

12 लाख करोड़ के लोन माफ़ कर दिए गए ,देश के बेंको का दिवाला निकलने वाला था . मोदी ने नोट बंदी ला कर बेंको में पैसे रखना ज़रूरी बना दिया . देशवासियों के पैसे से ही अपने दोस्तों को पूरा पैसा लुटा दिया . क्या ये सही हैं मित्रो ?

आज भूल जाइए की आप किस राजनैतिक दल से हैं या में किस विचार धारा का ,इतना तय हैं देश द्रोही नहीं हूँ .

देश के सवाल पर में जानता हूँ हम सब एक हैं . गरीबो और मध्यम वर्ग की परेशानियों को हम झेलते हैं . नेता नहीं .

मोदी सरकार अगर इतनी ही ईमानदार हैं . तब क्यों नहीं सांसदों का फोन भत्ता बंद करती . जो हर महीने 15000 के आस पास मिलता हैं आज आप और हम सब 300 से ले कर 400 के बीच में दो तीन महीने के लिए निश्चिन्त हो जाते हैं . तब क्या जियो वाला दोस्त देश के नेताओं को फ्री सुविधा दे कर उस भत्ते को बंद नहीं करा सकता . जिसका पैसा आप की हमारी जेब से जाता हैं .

आज राहुल गाँधी  होते तो वही करते ,जिसके बारे में संसद में वरुण गांधी ने बोला था . आखिर देश के लिए त्याग करने वालो का खून सही बोलता हैं . वरुण ने संसद में सांसदों के वेतन बढाने के मुद्दे पर सवाल उठाये थे . किसी मीडिया ने देश को दिखाया . मोदी जी का मोदियापा दिखाने से किसी को फुर्सत कहाँ हैं ?

मीडिया भी रेल में चलने वाले उस यात्री की तरह हो गया हैं जो बिना टिकट लिए चलता हैं और रेल के शौचालय में लगा शीशा खोल कर ले जाता हैं .

भारतीय राजनीती में ऐसे बहुत से जो समाज और जाती के ठेकेदार बन कर वोट लेते हैं . परन्तु उनके लिए कभी कुछ करते नहीं .

राहुल गाँधी वो उम्मीद हैं ,अखिलेश यादव वो आशा हैं ,तेजस्वी वो आक्रमण हैं ,हार्दिक वो संगठन का माहिर हैं ,कन्हैया जो शोले के गब्बर का एनकाउंटर हैं .

क्या देश के नेता इनको पसंद करेंगे ?

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