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राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी ने अंग्रेजों की दलाली नहीं की ।

Mahatma Gandhi
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गाँधी जी ने अंग्रेजों की दलाली नहीं की ।


आजादी की लङाई लङने का गाँधी जी ने कोई टेण्डर थोङे ही छुङवा लिया था……?
गोडसे के बाप या दादा को किसने रोका था कि आजादी की लङाई का नेतृत्व ना करें ?
मेरे या आपके बाप दादा या परदादा ने क्यों नहीं नेतृत्व किया उनको किसने रोका था ?

जाहिर सी बात है वे खुद ही इस लायक नहीं थे कि वे नेतृत्व कर सकें जिस दिन वे (संघीय) ये समझने की सामर्थ्य पा लेंगे गाँधी जी को गाली देना बंद हो जायेगा.

गाँधी जी जिस वर्ग से थे उन्होने उस वर्ग से थोङा बहुत ही सही आगे बढ कर ईमानदारी से कार्य किया. मेरा यह कहने कतई अर्थ नहीं है कि अन्य शहीदों का कम योगदान है ।

मैं यह कहना चाहता  हूं कि आजादी की लङाई में गाँधी जी अफ्रीका से लौटने के पश्चात ही शामिल हुए वे उस वक्त 41 साल के थे और बाल बच्चेदार थे और कामयाब वकील थे.
फिर भी वे अपना व्यक्तिगत पेशा छोङकर पूरे देश में घूम रहे थे कभी कलकत्ता कभी लाहोर कभी बिहार…

बिहार का चंपारण आंदोलन

जगप्रसिद्ध भी है उस समय आंदोलन का नेता बनने का मतलब क्या होता होगा जरा कल्पना कीजिए उस समय की जब किसी अफसर ने उनको चम्पारण छोङकर बाहर जाने का आदेश दिया हो.

और वहॉं के साथी वकील भी चले जाने के लिए राय दे रहे हों तब वहां उस शख्सियत ने अङियल रूख अपना कर उन लोगों को राहत दिलवाने में जो योगदान दिया वैसे योगदान की मिसाल मंडेला भी नहीं है.

गाँधी जी प्रैक्टीकल थे युटोपिया नहीं थे वे भारत के जन मानस की असली औकात समझते थे और शासक वर्ग की शातिर सोच से पूर्णतया वाकिफ  थे.

लोग ही जब लङने से पीछे हट जाते थे तब आंदोलन वापिस लेना ही पङता है.

अभी ताजा उदाहरण लोकपाल आंदोलन के लिए किए धरने ही हैं जिसे लोगों की कम भागीदारी के कारण वापिस लेना पङा था .

जब माहौल बनाने में वे कामयाब होते उस समय आंदोलन की अपील कर देते थे और जनता का जोश घटने लगता था वे समझौता कर लेते या आंदोलन वापिस ले लेते थे .

आंदोलन या धरने के दौर में यही तो चल रहा था .

गाँधी जी का “चरखा” मानचेस्टर पर बम बन कर फूटता था.

मानचेस्टर की मीलों का तैयार माल जब नहीं बिकता था.

तो वहां के मील मालिक छंटनी करते थे, छंटनी हुए कारीगर वहां के मंत्रियों और सरकार के नाक में दम कर दिया करते थे ये सब बातें वहां के अखबारों की सुर्खियां बनती थी.

फलतः वहां के नागरिक भारत की आजादी के हक में माहौल बनता जा रहा था.

ये सब काम अन्य कार्यों से संभव नहीं था.
दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त होते ही ब्रिटेन में आम चुनाव हुए
ब्रिटेन में उस वक्त दो प्रमुख राजनीतिक दल थे एक पार्टी जो सत्ता में थी उसका नाम है कंजरवेटिव .

उस समय के प्रधानमंत्री और पार्टी के नेता विंस्टन चर्चिल थे जो भारत को किसी भी कीमत पर आजाद नहीं करना चाहते थे,
दूसरी पार्टी के नेता थे एटली.

एटली ने अपने चुनाव घोषणापत्र में भारत को आजाद करने का वायदा किया आपको हैरानी होगी जानकर ब्रिटेनवासियों ने भारी बहुमत से एटली की पार्टी को जिता दिया था.

सीधी सी बात बिल्कुल साफ साफ गाँधी जी ने जो भी किया दिल से किया ईमानदारी से किया .

गाँधी जी के किसी भी काम में दोगलापन नहीं है.

उन्होंने स्कूल और कालेजों का बहिष्कार किया तो अपने बेटों का भी सरकारी स्कूल छुङवा दिया .
कस्तूरबा गांधी जी का इन सब बातों के कारण गाँधी जी का विरोध करती थी.

यही सब सामाजिक काम करने वालों के भी अनुभव में शामिल रहता है .

हमें, कम से कम मुझे तो अपने देश मे देश के गाँधी पर नाज है .

एक आज का क्रांतिकारी लेखक

पिंटू पाण्डेय

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