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Power politics :नितीश कुमार आज नैतिकता की बात करते हैं ,कभी वो भी ?

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Power politics :नितीश कुमार आज नैतिकता की बात करते हैं ,कभी वो भी ?


राजनीती और सत्ता का खेल निराला हैं ,जिसको मिले वो भी दुखी ,जिसे न मिले वो भी दुखी . कारण भले ही अलग अलग हो लेकिन ये सियासत का  कठोर  सत्य हैं .

सत्ता की हनक हैं ही कुछ ऐसी ,जिसको इसका स्वाद लग जाए नये को आगे आने न दे . और नये को मिल जाए तो पुराने को किनारे लगा दे . लाल क्रष्ण आडवानी इसका अनुपम उदाहरण हैं .

बिहार की राजनीती में भाजपा और मीडिया कुछ इस कदर बेसब्र हो गया हैं ,जैसे तेज़स्वी के इस्तीफे का एलान होते ही केंद्र सरकार से ,खबर बताने वाले को पदम् श्री मिल जाएगा .क्षेत्रीय दल हो या राजनैतिक विरासत समेटे कान्ग्रेस सब दलों में एक बदलाब का दौर हैं .

राजनैतिक विरासत को अगली पीडी को सौपने का समय हैं . अखिलेश यादव, तेज़स्वी यादव उस बदलाब का सिर्फ  एक हिस्सा हैं .

आगे आने वाले समय में कांग्रेस जन एक अरसे से राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने  की प्रतीक्षा देख रहे हैं . ख़ास तौर पर युवाओं का एक बड़ा भाग जिसकी आशाये नाउम्मीदी में बदल गयी हैं .

जे  डी यू  की तरफ से रोजाना श्रीमान के .सी त्यागी जी के ब्यान भ्रम की स्थती  पैदा कर देते हैं . जिससे तेज़स्वी के इस्तीफ़े की हवाए जोर पकड़ने लगती हैं . आज के नितीश कुमार जरूर नैतिकता की बात करे कभी वो भी अपराधियों की बैसाखी लगा कर बिहार की राजनीती के रथ पर सवार हुए थे .

ये अखवार की कटिंग जब की हैं जब मुन्ना शुक्ला ,राजन तिवारी और बाहुवली सूरजभान सिंह का समर्थन ले कर नितीश कुमार ने बिहार की राजनीती में सीडिया चडनी शुरू की थी .

आज नितीश कुमार नैतिक कुमार बन गए हैं .

भाजपा की केंद्र सरकार जिस तरह से लालू परिवार पर हमलावर हैं उस तरह से लगता हैं जैसे सब कुछ मुख्यमंत्री नितीश के इशारे पर हो रहा हो .

मामला राष्ट्रपति चुनाव के प्रत्याशी को लेकर शुरू हुआ था .बिहार में नितीश बिहार के डी एन ए,और बिहार की बेटी के सवाल पर घिरे थे . तब कोई न कोई बड़ा धमाका तो होना ही था .

भले ही अटकले शांत हो गयी हो . नितीश कुमार ने महागठबंधन के नाम पर जो पहल की थी . वो उनके ही चलते खत्म हो रही हैं .

कांग्रेस एक बड़ी राष्ट्रीय पार्टी हैं . उसे अकेले आगे आ कर भाजपा का मुकाबला करना चाहिए . अगर वो क्षेत्रीय दलो के साथ ताल मेल में गयी तो उसके ही अस्तित्व का खतरा .

सही समय आ चूका हैं .कांग्रेस के अकेले सफ़र तय करने का फिर अगर वाकई कोई संघ की विचारधारा से लड़ना चाहता हैं तो वो दल खुद कांग्रेस के पास आये .

कभी संघ मुक्त भारत की बात कहने वाले मुख्यमंत्री नितीश कुमार राष्ट्रपति पद के लिए एक संघ के ही प्रचारक को अपना समर्थन दे चुके हैं . उन पर ज्यादा भरोसा ठीक नहीं .

तेज़स्वी यादव और लालू यादव चाहे तब आराम से इस्तीफ़ा दे कर सहानुभूति के रथ पर सवार हो ,लोक सभा में अकेले दम पर भाजपा को कांग्रेस के साथ मिल कर धुल चटा सकते हैं .

 

 

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