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पी एम मोदी हो या परेश रावल बोलने में क्या जाता हैं ?

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मोदीजी ने आज अपनी इस्राइल यात्रा के दौरान बड़ा एक बड़ा रहस्योद्घाटन कर डाला । उन्हीने कहा कि इस्राइल ने भारत के 1965 और 1971 के युद्ध में सहायता की थी।

अब पी एम बोले तो क्या मजाल की इतिहास की किताबो को छुआ जाए । या सच्च की तलाश की जाए । क्या ज़रुरत हैं ,उनके समर्थकों के लिए मोदी जी का बताया इतिहास सच्चा हैं ।

वैसे किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की इस्राइल से संबंधों की बात पहली बार 1985 में आगे बढ़ी थी। जब स्व, राजीव गांधी 1985 में शिमोन परेज़ से मिले थे ।

कुछ इतिहास के झरोखों से google पर उपलब्ध जानकारियाँ ;-


1950:भारत ने इजरायल को 1950 में मान्यता दी। पर कूटनीतिक संबंध 1992 में बने। क्योंकि भारत इजरायल के धुरविरोधी फिलिस्तीन का समर्थन करता था।
– 1962: चीन से हुई में इजरायल ने भारत को मोर्टार, मोर्टार रोधी उपकरण  दिए थे। 1965, 71 और कारगिल युद्ध  में इजरायल ने भारत को सैन्य साजो सामान मुहैया कराए।

– 1977: मोरारजी देसाई सरकार ने इजरायल से संवाद  शुरू किया। उस समय इजरायल के रक्षा मंत्री कई सीक्रेट ट्रिप पर भारत आए।

– 1985: यूएन असेंबली से  तब पीएम रहे राजीव गांधी, इजरायली समकक्ष शिमोन पेरेज से मिले। यह दोनों देशों के प्रमुखों की पहली सार्वजनिक मुलाकात थी।

– 1992: प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने दोनों देशों के बीच चली आ रही झिझक को खत्म करते हुए इजरायल के साथ पूर्ण राजनीति रिश्ते शुरू किए।

– 2003:पहली बार भारतीय विदेश मंत्री जसवंत सिंह इजरायल गए।

– 2015: प्रणब मुखर्जी इजरायल जाने वाले देश के पहले राष्ट्रपति बने।


1999 के कारगिल पर भी पी एम इस्राइल को श्रेय दे रहे थे। वो भूल गए या याद नहीं ?

बोफोर्स ने वो युद्ध जीता था । तब की मीडिया रिपोर्टिंग में कही भी इस्राइल का उल्लेख नहीं मिलता हैं ।

भाजपा सरकार के नेता हो या समर्थक झूठ और अफवाह का पूरा बोरा अपने सर पर लाद कर चलते हैं । सही खबरों की प्रामाणिकता मांगते हैं । अपने झूठ का प्रमाण देने की जगह अपशब्दों का प्रयोग आम बात हैं।

एक निजी अवधारणा इन दिनों आम हैं । मोब लिंचिंग केवल देश भर में हत्याओं के रूप में ऐसे ही नहीं आ रही । इन सबके पीछे एक सुनियोजित एजेंडा सोशल मीडिया से ले कर शहरो ,क्सवो और गाँव में घूमने वाले ब्रेनवाश किये हुए युबा हैं । जिनको एक लंबे समय से तैयार किया जाता रहा । भूतपूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहराव से ले कर भू.पू. पी एम सरदार मनमोहन देश को विकास की रफ़्तार दे रहे थे । तब संघ अपने एजेंडे को उसी रफ़्तार के साथ युबायो में बाँट रहा था ।

अभी सोशल मीडिया का एक ताज़ा  मामला झूठ और अफवाह का फिल्म एक्टर परेश रावल का भी हैं । जो और भी ज्यादा शॉकिंग हैं ।

भाजपा के सांसद और बॉलीवुड एक्टर  परेश रावल ने सोमवार को अपने ट्वीटर हैंडल से पूर्व राष्ट्रपति डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम की फोटो शेयर की, जिस पर एक कॉवेट  लिखा हुआ था।

जो पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम आज़ाद की जानिब से लिखा बताया जा रहा था इनकी तस्वीर के साथ कोट लिखा था कि,


“मुझे पाकिस्तान ने अपने तरफ मिलाने की हर संभव कोशिश की!मुझे देश का हवाला दिया गया मुझे इस्लाम का हवाला दिया गया मुझे कुरान का हवाला दिया गया लेकिन मैंने अपनी मातृभूमि से कोई गद्दारी नहीं की क्योंकि अपने कर्तव्य से हटना मेरे धर्म और देश दोनों के लिए एक बदनामी की बात होती!”


जबकि इस तरह का वक्तव्य डॉक्टर कलाम का कहा या लिखा हुआ हैं ही नहीं।

इसके बाद समझदार लोगों ने ट्विटर पर परेश रावल की क्लास लगा दी।

कुछ लोगों ने जहां उनसे इस बाबत सीधे सवाल पूछे वहीं कुछ ने उन्हें मूर्ख तक भी कह दिया।पहले परेश रावल ने किया ये ट्वीट- ‘

 

अब समझ नहीं आता की ये देश अब अफवाहों के इतिहास के सहारे चलेगा । सेल्फी झूठे विज्ञापन ,झूठे कथन ,झूठे वायदे,जनता को धोखा ,धोखा और धोखा

इस बात में कोई दो राय नहीं की झूठ जितनी बड़ी ज़िम्मेवार शख्शियत बोलेगी । उसको सच मान लिया जाता हैं ।  भाजपा के कार्यकर्ताओं द्वारा उनका माइंड सेट कुछ इस तरह से सेट किया हैं । कि अगर कोई मंत्री कहे की पेड़ से निकलने वाली कार्बन डाई ऑक्साइड लाभकारी हैं तो वो उसको भी स्वीकार कर लेंगे । बिना किसी तथ्य के ,जैसे गांधी और नेहरू के बारे में फैलाई गई अफवाहों पर वो यकीन करते हैं ।

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