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राहुल गाँधी और एक अनछुआ पहलू

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दिनांक चौबीस
फरबरी 2015

 

‘’हम सब और हमारा
परिवार  कही न कही से परम्परावादी और
संस्कारित समाज के निर्धारित मानदण्डो का अनुसरण करते हैं और यही परम्पराएं बदलते
परिवेश में रुदिवादी हो जाए तो उनका अनुसरण कभी कभी घातक हो जाता हैं’’

हम सब आये दिन
अपने परिवार और समाज में इसका सामना करते हैं ज़हा हम बदलाव चाहते हैं हमारे घर के
बुजर्ग  परिवर्तन को स्वीकारने में हिचकते
हैं हमारे विचारो के साथ बदलना उनको मंज़ूर नहीं होता ऐसा मेरे साथ भी कई बार हुआ
में भी परिवार मे रहा सयुक्त परिवार में

घर का बड़ा
बेटा  होने के नाते में भी ज़ल्दी समझने लगा
था अपनी जिम्मेवारी  लेकिन परिवार ने हमेशा
मुझे एक बच्चे के तरह ही समझा मेरे विचारो को सुनते थे पर माना कभी नहीं परिणाम वो
हुआ जो में पहले ही जान चूका था पूरे परिवार ने दुष्परिणाम भुगते …..

और अब आप ज़रा
सोचो एक युवा नेता जो कांग्रेस परिवार का ही नहीं
पूरा देश जिसका परिवार था कोई भी मामला होता था
तो पूरा देश उनके विचार जानना चाहता था मीडिया जिनको जनता के बीच तलाश करता था
लेकिन घर के बुजुर्गो की नसीहते,… परंपरा का हवाला,… हमेशा न चाहते हुए भी मौन
रहने पर मजबूर कर देता था ,ये बोलो, ये मत बोलना, ऐसा मत करना, जैसे अपना वास्तविक
सब कुछ कही खो सा गया था

ऐसा नहीं था की
श्री राहुल गांधीजी के पास देश और प्रदेशो की सूचनाये नहीं हैं  उनका सूचना तंत्र पूरे देश और प्रदेशों में
फैला था  जब भी कोई फैसले वो लेते उनको पार्टी के अन्दर ही कुछ असुरक्षित नेता जो
केवल अपने चाटुकार बल पर पार्टी के शीर्ष नेत्रत्व को गुमराह करने में माहिर थे
जान बूझ  कर विपक्ष के साथ सांठ गाँठ कर एक विपरीत छवि बना दी जाती थी
वही बात

‘’खाया पिया कुछ
नहीं गिलास टूटा आठाने का’’

और कब तक सहन
किया जा सकता था और किस लिए जब अपना खुद का अस्तित्व खतरे में आ जाए तो संघर्ष एक
मात्र विकल्प होता हैं

और अब परिवर्तन
ही विकल्प था

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