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कुछ पुरानी बहुत पुरानी यादे

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कुछ पुरानी बहुत पुरानी यादों की गठरी
का बोझ

 

उठाए में अकेला अपनी हस्ती की तलाश में

 

रस्ते मालूम नहीं ,बस अपनी मंजिल
पाने  की धुन में

 

कुछ पुरानी बहुत पुरानी यादों की गठरी
का बोझ

 

वो आखरी घर भी नज़र नहीं आता अब इन
पहाड़ों से

 

ज़हा बीती सर्द रात गुजारी थी उस लकड़ी
के बने घर में

 

कुछ पुरानी बहुत पुरानी यादों की गठरी
का बोझ

 

 पता नहीं क्यों चलते अक्सर नमी आँखों में आ जाती
हैं

 

कुछ तो बात थी उसकी नफरत अब भी याद आ
जाती हैं

 

कुछ पुरानी बहुत पुरानी यादों की गठरी
का बोझ

 

सवाल ज़हन में अक्सर उससे जुड़ा जो मेरा
कभी न हो सका

 

की उसकी नफरत में छुपे प्यार को में
पहचान ना सका

 

 कुछ पुरानी बहुत पुरानी गठरी का बोझ

 

याद हैं आज भी मुझको नम आँखों से उसका
मुझसे कहना

 

की तुम कभी लौट के मत आना,न कभी मुझे
ख़त लिखना

 

 कुछ पुरानी बहुत पुरानी यादों की गठरी का बोझ
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