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मीडिया का तिलिस्म और चुनाव २०१४

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मीडिया का तिलिस्म और चुनाव २०१४:

अब इस बीच लोकसभा चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो चुकी थी …….

 

मीडिया को अपनी शक्ति समझ में आ चुकी थी
और
मीडिया मौका नहीं छोड़ना चाहता था
आखिर कुछ बेनाम से चेहरों को उसने दिल्ली की राजनीती में एक राजनैतिक पहचान जो दी थी ……..

 

और इस देश में एक ऐसा चुनाव होने जा रहा था जो अभी तक के इतिहास में शायद पहले कभी नहीं हुआ था …..

 

गुजरात मॉडल की ब्रांडिंग पहले से ही सोच समझ तेयार कर ली गयी थी .
अब एक शातिर राजनीती के श्ब्द्जालों का ,कुटिलताओं का ,साम ,दंड भेद की राजनीति का विशुद्ध प्रयोग.
इन चुनावों में होने के लिए तेयार था.
और जब धन का प्रयोग भी शामिल हो जाये तो फिर कहने ही क्या सीधे साधे नेता कहाँ सामना कर पाते.
दो मुख्य नेता मीडिया के सामने थे एक दिल्ली को बना कर आया था .
जिसको मीडिया ने तैयार किया था केज़रिवाल तो एक गुजरात का अच्छा ख़ासा प्रशासनिक अनुभव लिए श्री नरेंद्र मोदी आमने सामने ,और आर.एस. एस के समर्थन के साथ बिसात तेयार थी
शकुनी की तरह पैत्रेवाजी में माहिर मोदीजी के सेनापति थे श्री अमित शाह हर फन में महारथी
उत्तर प्रदेश फिर सुलग उठा था.
साम्प्रदायिकता से धुर्विकरण हुआ और जम के हुआ पर गरीबों और धरम निरपेक्षता की हिमायत करने वाली कांग्रेस के पास सिवाए अधिकार नीति के अलावा कुछ नहीं इस धर्म युद्ध में शस्त्र हीन खड़ी एक पार्टी गरीबों की अल्पसंख्यकों की ,आम लोगों के अधिकार की बात करने वाली कांग्रेस बिना किसी आडम्बर के चुनाव प्रचार शुरू हुआ खूब व्यक्तिगत हमले गाँधी परिवार पर हुए

 

बड़े बड़े वादे किये गए देश को अमेरिका जैसा बनाने का सपना दिखाया गया
आधुनिक तकनीके इस्तेमाल हुई सोशल मीडिया का तो जमकर इस्तेमाल हुआ ……….

 

मीडिया हाउस क्या भूमिका थी आप सबको पता हैं ……………..

 

जनता भी स्वप्न लोक नें खो गयी थी वो इतने अच्छे सपने से जागने को तेयार नहीं थी

 

कांग्रेस के शासन काल में मिली उपलब्धियां ही उसके खिलाफ इस्तेमाल की गयी चाहे वो सोशल क्रांति हो या मीडिया की आज़ादी …………….?
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