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दिल्ली की सर्दियों में चुनावी तपन

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दिल्ली की सर्दियों में चुनावी तपन का अहसास होने लगा था
और इस बीच ओबामा और प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के रिश्तो को  मीडिया अपनी अपनी क़ाबलियत का तड़का लगाकर जनता के
बीच प्रचारित कर रहे थे इस जोश जोश में कई नयी परम्पराओं का आविष्कार हो चूका था
……..

और दूसरी तरफ सत्ताईस जनबरी को राहुल जी के रोड शो का
एलान हो गया था और अब देखना दिलचस्प था की दिल्ली की जनता कितना उत्साह दिखने वाली
थी श्री राहुलजी के रोडशो में हालांकि माकन ,लवली और हारून युसूफ की तिकड़ी विरोधियो
को धता बताने के लिए अपने रंग में नज़र आने लगे थे ….

सारे विरोधिओं की निगाहें रोड शो पर लगी थी…………….

क्युकी विरोधियो की आगे की रणनीति इसी पर टिकी थी …

सत्ताईस जनबरी सुबह का वक्त करीब पांच बजे धीरे धीरे
युवाओं के छोटे छोटे झुण्ड कालकाजी में ज़मा होने लगे थे और समय आते आते राहुलजी के
साथ एक बड़ी तादाद और जनसमूह एक बड़े जान सैलाब में तब्दील हो चूका था जैसे जैसे राहुल
जी  का काफिला आगे बढता वैसे वैसे लोग साथ होते
जा रहे थे राहुलजी के व्यक्तित्व और सहजता से प्रभावित युवा वर्ग किसी भी तरह राहुलजी
और कांग्रेस पार्टी से जुड़ना चाहता था
उनके प्रति दीवानगी का पता इसी बात से चलता था और
दिल्ली के युवा उत्साहित थे ऐसा लग रहा था उर्जा और स्पंदन का संचार पूरी पार्टी में
हो चूका था शाम होते होते जब रोड शो ख़त्म हुआ तब तक एक विशाल रूप हो गया था उस ज़न्
सैलाब का मीडिया ने ये खबर दिखने से बची और टिप्पड़ी से भी लेकिन विरोधिओं के माथे पर
चिंता की लकीरें आ गयी थी शायद दिल्ली की जनता का ये रुख कुछ और कहानी और चेतावनी दे
गया था विरोधिओं को ..
और अगले दिन भाजपा के बड़े बड़े मंत्रिओं को देश का काम छोड़ दिल्ली के चुनाव
में लगा देने का आदेश हो चूका था क्या यही था सुशासन…..

 की केन्द्रीय मंत्री हो या मुख्यमंत्री
सांसद हो या विधायक सबको दिल्ली में इकठ्ठा हो कर चुनाव प्रचार की जिम्मेवारी सौपी
जा रही थी सरकार का काम छोड़ कर’’’’’’

 कैसा शासन था और युवाओं को क्या आदर्श
दिए जा रहे थे सुशासन या केवल सत्ता की भूख जो खत्म होती कही दिखाई नहीं दे रही थी

घबराहट थी क्युकी आज रोड शो राहुलजी का नहीं ‘’सत्य
का था

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