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अन्नाजी की छटपटाहट

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दिल्ली के नतीजों
ने आँख खोल दी थी भाजपा की और अब डैमेज कंट्रोल की कोशिशें तेज़ कर दी थी सरकार की
कमियों को मीडिया किसी और और बे मकसद
मुद्दे को हवा देकर छुपाने की कोशिश करता था और भूमि अधिग्रहण पर कांग्रेस
का दाव जैसे ही भाजपा को पता चला तो गोविन्दाचार्य पहले से ही अन्नाजी का रुख कर
चुके थे अब उनके कंधे पर बन्दूक रख कर निशाना लगाने की तैय्यारी शुरू कर दी गयी थी
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अन्नाजी की छटपटाहट

जग ज़ाहिर हो चुकी थी

और मुझे याद आया था

  जब अन्ना अपनी बात से पहली बार पलटते हुए नज़र
आये थे ममता बनर्जी के साथ और दिल्ली में रैली ज़ह अन्नाजी और चंद खाली पड़ी
कुर्सियां और अन्नाजी की T.M.C को समर्थन वाली वो रैली

अपने को अराजनैतिक बताने वाले अन्ना का वो सच

अजीब से बात थी आज एक बार फिर अन्ना लोकपाल को भूल चुके थे.

अब मोदी सरकार से काले धन पर वो किसी
आन्दोलन की घोषणा नहीं कर रहे थे ना ही लोकपाल बिल की वकालत आज उनको सिर्फ
भूमिअधिग्रहण क़ानून नज़र आ रहा था और किसान नज़र आ रहे थे आत्म्प्रसिधि के लिए
ललायित दिख रहे थे केज़रिवाल ने समर्थ का वायदा तो किया था और चुकी मुद्दा कांग्रेस
के पास अपनी सरकार में पास हुए भूमिअधिग्रहण बिल को रद्द किये जाने का और वो भी
सीधा राहुल गांधीजी की प्रतिष्टता का सवाल बन गया था और कांग्रेस पार्टी एक व्यापक
जन आन्दोलन छेड़ने की तैय्यारी कर रही थी तो अन्ना अपनी ढपली ले कर बीच में कूद रहे
थे अन्नाजी चाहते तो अपना समथन उन दलों को देते जो किसानो के लिए आन्दोलन करते
क्युकी राजनैतिक पार्टी ही संसद और विधानसभा में किसानो के हितों के लिए लडती हैं
……………..

ये सब राजनैतिक उठापटक देख कर तो साफ़ नज़र आ रहा था सत्तारुद दल अन्ना के सहारे अपनी महत्वाकांक्षा
साध रहा था

क्युकी किसी बड़े आन्दोलन की संभाबना हो तो उसके समानंतर उन्ही मुद्दों को लेकर आन्दोलन खुद खड़े करा
दो और एक ही मुद्दे पर जब कई दल अपनी अपनी विचारधाराओं के साथ लड़ेंगे तो वो
आन्दोलन अपना मुख्य सवरूप ही खो देगा

गोविन्दाचार्य को भाजपा का थिंक टैंक माना जाता हैं और अन्ना के पूर्व में हुए आंदोलनों के खुलासे
ने अन्नाजी के उपर कई प्रश्न लगा दिए थे

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